क्योंकि, हम पशु नहीं हैं
May 22, 2006
बहुत बार पढता हुं या सुनता हुं तो आश्चर्य होता हैं कि पशु-पक्षी सिर्फ संतति के लिए ऋतु में ही सम्बन्ध स्थापित करते हैं, जबकि मनुष्य वर्षभर सेक्स के पीछे दौङता रहता हैं, जो कि अनुच्चीत हैं. अगर कुदरती नियमो का पालन करें तो सिर्फ संतति के लिए ही सेक्स सम्बन्ध स्थापित होने चाहिए, तो क्या मनुष्य ऐसा न कर अपराध करता हैं ? मैं कहुंगा, ‘नहीं’
क्यों ?
आइये देखे.
भोजन हर प्राणी ग्रहण करता हैं. पौधे ज़मीन से पोषक तत्व खिंचते हैं फिर प्रकाश-संस्लेष्ण द्वारा अपना भोजन बनाते हैं. पशु चरते हैं या शिकार करते हैं. जबकि मनुष्य क्या करता हैं?
वह खेती करता हैं, वहां से अनाज लोगो के घरो तक पहुंचता हैं, वहां उसे विधिवत पकाया जाता हैं, मसाले डाले जाते हैं, ध्यान रखा जाता हैं कि भोजन पौष्टिक और रुचीपुर्ण हो. व्यवस्थित परोसा जाता हैं, फिर सभ्यता से खया जाता हैं. इतना सब क्यों?
क्योंकि हम पशु नहीं हैं. हम चर नहीं सकते, न ही पशुओ कि तरह जुगाली कर सकते हैं. कहने का मतलब यह हैं हमारी तुलना कभी भी किसी भी बात को लेकर पशुओ से तुलना नहीं हो सकती. फिर सेक्स को लेकर पशुओ से तुलना क्यों?
वैसे भी सभ्य समाज में पशुतुल्य सेक्स को (बलात्कार को) अपराध माना जाता हैं.
प्रकृति कि दुहाई देने वाले क्या अपना घर, परिवार, भोजन का तरीका, गाँव-शहर, चिकित्सा, भाषा आदी का त्याग कर सकते हैं? क्योंकि यह सब मनुष्य ने अपने जीवन को सरल-सुखी और आनंद दायक बनाने के लिए बनाये हैं.
माने या न माने पुरी सभ्यता प्रकृति का अतिक्रमण कर खङी कि गयी हैं. जंगलो से सीधे भोजन प्राप्त करने के स्थान पर खेती तथा बहती नदीयों पर बाँध और नहरे का निर्माण , प्राकृतिक आवासो के स्थान पर इमारते, रोगो तथा दर्द से छुटकारा पाने के लिए चिकित्सा पद्धतियां. सभी प्रकृति के विरूद्ध हैं.
पशुओ कि तुलना में मनुष्य ने हर उस वस्तु को परिष्कृत करना जारी रखा हैं जो उसे आनंद देती हैं.
चन्द ध्वनियों के स्थान पर भाषाओं, लिपियों तथा संचार के साधनो का अविष्कार, कच्चे भोजन के स्थान पर विधिवत पकाये गये अनेक प्रकार के भोजन, सुख-सुविधापुर्ण आवास आदि-इत्यादि, लेकिन जब बात सेक्स कि हो तो वहीं आदिमयुग पर बात अटक जाती हैं. प्रकृति के नियम याद आते हैं. होना यह चाहिए कि सेक्स को गुप्त शब्द से मुक्त किया जाय. गुप्तज्ञान, गुप्तरोग और न जाने क्या-क्या.
काम-कला को लोग मुक्त और स्वस्थ मन से स्वीकारे, काम विधियों का, साधनो का परिष्कार हो. व्यक्ति अधिक से अधिक आनंद प्राप्त करे ऐसा वातावरण बने.
काम कला पर भी अधिक से अधिक साहित्य लिखे जाने चाहिए और उन्हे अन्य साहित्य के साथ स्थान मिलना चाहिए, तभी अश्लिल संजालो तथा साहित्यो से मुक्ति मिल सकती हैं. लोग नीम हकिमो के चंगुल में आने से बच सकते हैं.
May 22, 2006 at 8:18 am
आपके इस नये साहस पर बधाई संजय भाई, शायद कमेंटियाने से सभी संकोच कर रहे हैं। बाकी पढ़ तो अभी रहे हैं इस चिठ्ठे को।
May 22, 2006 at 12:31 pm
बहुत ख़ूब संजय भाई। हिन्दी में इस विषय-वस्तु पर पर्याप्त सामग्री नहीं है, उम्मीद है आप इस विषय पर तथ्य परक वैज्ञानिक विश्लेषण और व्याख्या प्रस्तुत करेंगे।
May 22, 2006 at 1:00 pm
समर्थन के लिए धन्यवाद सागर तथा प्रतिक भाई.
मैं कोशीष करूंगा कि स्तरीय सामग्री यहां से प्रकाशीत हो.
May 23, 2006 at 12:39 pm
अच्छा प्रयास है. इसमे मुझे तो कोई बुराई नज़र नही आती जब तक कि यह ज्ञानवर्धन का साधन रहें.संजय भाई, इस साहसिक कदम मे हम आपके साथ हैं.जमाना बहुत आगे बढ गया है और लोग योन जानकारी और अश्लिलता मे अंतर समझते हैं.
मेरी बधाई स्विकार करें.
May 23, 2006 at 8:15 pm
आपकी दूसरी पोस्ट नारद पर है पर यहां नहीं दिखायी पड़ रही है
May 23, 2006 at 9:35 pm
Categories पर क्लिक करने पर भी दिखाई पड़ रही है, पर permalink से नहीं। लगता है, वर्डप्रेस में कुछ गड़बड़ है।
May 25, 2006 at 6:09 am
बहुत ख़ूब !! सुंदर व सरल विवरण!
May 28, 2006 at 3:11 pm
काम एक सुखद अनुभूति है, लेकिन सभी इसे अश्लीलता की आँख से देखते हैं, पर आपका प्रयास बेहद सराहनीय है, साहित्यिक है |
April 20, 2007 at 3:45 pm
भैया हम पढे लिखे नाही है हम तो देख कर समझ सकते है का लिखो है तनिक बताओ फ़िर हमहू इहा भी पंगा ले लेगे
बहुत बढिया शुरुआत बधाई हो संजय
June 1, 2007 at 10:43 am
धेरै–धेरै राम्रो लेख, लेखललाई साधुबाद, फेरि पनि यस्तै पढ्न पाइयोस् ।