स्त्री तथा पुरूष क्यों?
May 24, 2006
एक कोषीय जीव स्वंय को विभक्त कर नये जीवो को जन्म देते हैं और अपना अस्तीत्व बनाये रखते हैं. परतुं जटील संरचना वाले जीवो को प्रकृति ने दो भागो में विभक्त कर दिया हैं- नर तथा मादा, स्त्री तथा पुरूष. जीवन को बचाये रखने के लिए प्रकृति कि व्यवस्था के अनुरूप दोनो को एक हो कर यत्न करना होता हैं और जो बल, जो भावना इस कार्य को करने के लिए उत्प्रेरीत करती हैं वह हैं ‘काम’.
‘काम’ जीवन को बचाये रखने के लिए नर और मादा के संयोजन के लिए प्रकृति का यत्न हैं. ऐसे में प्रश्न उठना स्वभाविक हैं कि हम स्त्री या पुरूष क्यों हैं?
एक कोषीय जीवो कि तरह ही एक लिंगीय मनुष्य भी मनुष्य को जन्म दे सकता था, फिर प्रकृति ने अन्य जीवो कि तरह इसे भी कुछ गुण-दोषो के साथ स्त्री तथा पुरूष के रूप में क्यों विभक्त किया ?
सम्भावित तर्कसंगत जवाब जो मुझे सुझ रहा हैं वह इस प्रकार हैं- कल्पना करे पुरूष से पुरूष कि उत्पत्ति हो रही होती या स्री से स्त्री कि, तब जो जीवन क्रमिक विकास हुआ हैं वह सम्भव हो पाता ? जैविक विविधता नहीं पनप पाती.
आज होता यह हैं कि मनुष्य के दो भागो स्त्री तथा पुरूष से जो नया मानव जन्म लेता हैं वह दो अलग-अलग धाराओं के वारसागत गुण लेकर पैदा होता हैं और विकास तथा परिष्कार कि प्रक्रिया निरंतर चलती रहती हैं
May 26, 2006 at 7:17 am
बहुत अच्छा लिख रहे हैं, संजय भाई. मै अभी भी आपके सथ हूँ. जारी रखें.
May 26, 2006 at 10:30 am
एक आपके समर्थन का ही तो भरोसा हैं.
September 11, 2007 at 6:19 pm
बहुत अच्छा लिख रहे हैं, संजय भाई. मै अभी भी आपके सथ हूँ. जारी रखें.