एक कोषीय जीव स्वंय को विभक्त कर नये जीवो को जन्म देते हैं और अपना अस्तीत्व बनाये रखते हैं. परतुं जटील संरचना वाले जीवो को प्रकृति ने दो भागो में विभक्त कर दिया हैं- नर तथा मादा, स्त्री तथा पुरूष. जीवन को बचाये रखने के लिए प्रकृति कि व्यवस्था के अनुरूप दोनो को एक हो कर यत्न करना होता हैं और जो बल, जो भावना इस कार्य को करने के लिए उत्प्रेरीत करती हैं वह हैं ‘काम’.
‘काम’ जीवन को बचाये रखने के लिए नर और मादा के संयोजन के लिए प्रकृति का यत्न हैं. ऐसे में प्रश्न उठना स्वभाविक हैं कि हम स्त्री या पुरूष क्यों हैं?
एक कोषीय जीवो कि तरह ही एक लिंगीय मनुष्य भी मनुष्य को जन्म दे सकता था, फिर प्रकृति ने अन्य जीवो कि तरह इसे भी कुछ गुण-दोषो के साथ स्त्री तथा पुरूष के रूप में क्यों विभक्त किया ?
सम्भावित तर्कसंगत जवाब जो मुझे सुझ रहा हैं वह इस प्रकार हैं- कल्पना करे पुरूष से पुरूष कि उत्पत्ति हो रही होती या स्री से स्त्री कि, तब जो जीवन क्रमिक विकास हुआ हैं वह सम्भव हो पाता ? जैविक विविधता नहीं पनप पाती.
आज होता यह हैं कि मनुष्य के दो भागो स्त्री तथा पुरूष से जो नया मानव जन्म लेता हैं वह दो अलग-अलग धाराओं के वारसागत गुण लेकर पैदा होता हैं और विकास तथा परिष्कार कि प्रक्रिया निरंतर चलती रहती हैं

बहुत बार पढता हुं या सुनता हुं तो आश्चर्य होता हैं कि पशु-पक्षी सिर्फ संतति के लिए ऋतु में ही सम्बन्ध स्थापित करते हैं, जबकि मनुष्य वर्षभर सेक्स के पीछे दौङता रहता हैं, जो कि अनुच्चीत हैं. अगर कुदरती नियमो का पालन करें तो सिर्फ संतति के लिए ही सेक्स सम्बन्ध स्थापित होने चाहिए, तो क्या मनुष्य ऐसा न कर अपराध करता हैं ? मैं कहुंगा, ‘नहीं’
क्यों ?
आइये देखे.
भोजन हर प्राणी ग्रहण करता हैं. पौधे ज़मीन से पोषक तत्व खिंचते हैं फिर प्रकाश-संस्लेष्ण द्वारा अपना भोजन बनाते हैं. पशु चरते हैं या शिकार करते हैं. जबकि मनुष्य क्या करता हैं?
वह खेती करता हैं, वहां से अनाज लोगो के घरो तक पहुंचता हैं, वहां उसे विधिवत पकाया जाता हैं, मसाले डाले जाते हैं, ध्यान रखा जाता हैं कि भोजन पौष्टिक और रुचीपुर्ण हो. व्यवस्थित परोसा जाता हैं, फिर सभ्यता से खया जाता हैं. इतना सब क्यों?
क्योंकि हम पशु नहीं हैं. हम चर नहीं सकते, न ही पशुओ कि तरह जुगाली कर सकते हैं. कहने का मतलब यह हैं हमारी तुलना कभी भी किसी भी बात को लेकर पशुओ से तुलना नहीं हो सकती. फिर सेक्स को लेकर पशुओ से तुलना क्यों?
वैसे भी सभ्य समाज में पशुतुल्य सेक्स को (बलात्कार को) अपराध माना जाता हैं.
प्रकृति कि दुहाई देने वाले क्या अपना घर, परिवार, भोजन का तरीका, गाँव-शहर, चिकित्सा, भाषा आदी का त्याग कर सकते हैं? क्योंकि यह सब मनुष्य ने अपने जीवन को सरल-सुखी और आनंद दायक बनाने के लिए बनाये हैं.
माने या न माने पुरी सभ्यता प्रकृति का अतिक्रमण कर खङी कि गयी हैं. जंगलो से सीधे भोजन प्राप्त करने के स्थान पर खेती तथा बहती नदीयों पर बाँध और नहरे का निर्माण , प्राकृतिक आवासो के स्थान पर इमारते, रोगो तथा दर्द से छुटकारा पाने के लिए चिकित्सा पद्धतियां. सभी प्रकृति के विरूद्ध हैं.
पशुओ कि तुलना में मनुष्य ने हर उस वस्तु को परिष्कृत करना जारी रखा हैं जो उसे आनंद देती हैं.
चन्द ध्वनियों के स्थान पर भाषाओं, लिपियों तथा संचार के साधनो का अविष्कार, कच्चे भोजन के स्थान पर विधिवत पकाये गये अनेक प्रकार के भोजन, सुख-सुविधापुर्ण आवास आदि-इत्यादि, लेकिन जब बात सेक्स कि हो तो वहीं आदिमयुग पर बात अटक जाती हैं. प्रकृति के नियम याद आते हैं. होना यह चाहिए कि सेक्स को गुप्त शब्द से मुक्त किया जाय. गुप्तज्ञान, गुप्तरोग और न जाने क्या-क्या.
काम-कला को लोग मुक्त और स्वस्थ मन से स्वीकारे, काम विधियों का, साधनो का परिष्कार हो. व्यक्ति अधिक से अधिक आनंद प्राप्त करे ऐसा वातावरण बने.
काम कला पर भी अधिक से अधिक साहित्य लिखे जाने चाहिए और उन्हे अन्य साहित्य के साथ स्थान मिलना चाहिए, तभी अश्लिल संजालो तथा साहित्यो से मुक्ति मिल सकती हैं. लोग नीम हकिमो के चंगुल में आने से बच सकते हैं.